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नर्मदा जीर्णोद्धार अभियान - हर मंदिर का हो जीर्णोद्धार

*"सकल विजित वसुधा पुष्प जला नर्मदा भवति"*
"सप्तकल्पक्षये क्षीणे न  मृता तेन नर्मदा।"
सात कल्पों के बीत जाने पर भी जो विद्यमान रहे उसे नर्मदा कहते हैं। ऋषि मार्कंडेय ने 21 प्रलय देखे और 21 बार ही नर्मदा को उन्होंने अमर पाया।  एकमात्र महानदी है जिसकी प्रदक्षिणा की जाती है। सभी देवस्थानों, तीर्थों की परिक्रमाओं से भी बढ़कर नर्मदा जी की परिक्रमा है।  इसके दोनों तटों पर स्थित 5000 से अधिक दिव्य मंदिर,शिवालय, आश्रमों की परिक्रमा दर्शन का लाभ भी साथ ही मिल जाता है। जो पुण्य गंगा जी के स्नान करने से प्राप्त होता है वह  नर्मदा जी के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है।
मां नर्मदा का जीवन जितना रहस्य से भरपूर रहा उतना ही दिव्य उसकी परिक्रमा पथ है। कहते हैं चिरकाल से गुप्त रूप में इतने ऋषि- मुनि, तपस्वी नर्मदा जी की परिक्रमा कर रहे हैं कि उनका कमंडल से कमंडल चिपक कर चल रहा है। यही कारण है कि साधु संत परिक्रमावासी और भक्त दोनों तटों पर शौच, गंदगी नहीं करते हैं किंतु अब स्थिति भिन्न है। उद्योग ग्राम, नगर सभी निर्बाध रूप से नर्मदा में गंदगी विसर्जित कर रहे हैं यही कारण है कि कभी 30 टीडीएस का नर्मदा जल आज जलकुंभी,  पिस्सु और अन्य प्रकार से दूषित हो रहा है व्यक्तिगत स्तर पर भक्तों आश्रमों ने तो घाटों और परिक्रमा मार्ग को स्वच्छ रखने का प्रयास कर रहे हैं किंतु पंचायतों-निगमों को मानव मल नदी में मिलने से तुरंत रोकना चाहिए।
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मां नर्मदा के दोनों तटों पर लाखों वर्षों से सनातन संस्कृति फली-फूली है। देव असुर ,नाग,गंधर्व, ऋषि- मुनि,सूर्य चंद्र,इंद्र कुबेर, असुरों ने यहां कठोर तप कर भगवान को प्रकट किया जो आज भी साक्षात् है। 
क्या हम जानते हैं नर्मदा तट पर कुछ स्थान ऐसे हैं जो द्वादश ज्योतिर्लिंग से भी प्राचीन है? सूर्य-चंद्र की जन्मस्थली कहाँ है? भगवान् वराह ने पृथ्वी का उद्धार कर कहां प्रकट हुए?  ब्रह्माजी ने तप? दधीचि की हड्डियों का दान स्थल?अग्नि देव  कहाँ प्रकट हुए? मार्कंडेय ऋषि के यज्ञ की भस्म कहां आज भी प्राप्त होती है? 400 वर्षों से प्रज्वलित नागा साधु की धूनी, माता अदिति ने की तपस्थली? ये सभी स्थान हमारे आसपास 50-100 किलोमीटर की दूरी पर खंडहर हो जीर्णोद्धार की राह देख रहे हैं। 
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नर्मदा परिक्रमा सर्वप्रथम कहां से प्रारंभ हुई? 
वह दिव्य स्थान किस तरह खंडहर हो रहा है? 
मुगल आक्रांताओं ने जितना नुकसान 1000 वर्षों में किया उससे कहीं अधिक आज पुरातत्व, राजनैतिक अनदेखी,  आमजन की अज्ञानता का शिकार हो रहे हैं।  देवताओं ,ऋषियों तत्वदर्शी और असुरों के द्वारा स्थापित शिवलिंग कभी खंडित नहीं होता, न ही विस्थापित किया जाता है किंतु *"बांधों के पानी में डूब के कारण कितने मंदिरों को उठाकर विस्थापित किया गया और इसका दुष्परिणाम गांगली, विमलेश्वर छोटी कसरावद वाराहेश्वर, ओंकारेश्वर में जनहानि के रूप में घटित हुआ। अनेक स्थानों से शिवलिंग पुराने, खंडित बता नए स्थापित किए गए और पुराने दिव्य शिवलिंगों को खेड़ी घाट आदि स्थानों पर फेंक दिया गया।* बांधों के बैकवॉटर से मिट्टी के भारी  कटाव के कारण नष्ट होने की कगार पर है। अयोध्या -काशी सोमनाथ से इतर भी दिव्य देवालय है जो अध्यात्म के प्रखर पुंज है।  वर्तमान में यह स्थान कहां-किस स्थिति में है? मैने   40 से अधिक स्थानों को खोजकर क्रम से लेख, विडियो में माहात्म्य का संकलन किया है और स्थानीय भक्तों के साथ अनेक स्थानों पर जीर्णोद्धार प्रारंभ हुआ है,
हम एक छोटा सा प्रयास कर रहे हैं। प्रतिवर्ष सहस्रों भक्त नर्मदा परिक्रमा करते हैं वे इन स्थानों पर तन- मन-धन से जीर्णोद्धार का प्रयास करें। यही सच्चे अर्थों में सेवा होगी।  
महानगरों से नर्मदा परिक्रमा के लिए पढ़े-लिखे लोग एडवेंचर हेतु आ रहे हैं ।आवश्यकता है इन स्थानों के महत्व को उजागर करना, वास्तविक स्वरूप में वापस लाना।  राजनैतिक इच्छा शक्ति के साथ ही जनमानस को जोड़ना, माता अहिल्याबाई का 300 मां जन्म शताब्दी वर्ष  है सभी को इन मंदिरों, घाटों का जीर्णोद्धार करने आगे आना ही होगा। 
त्वदीय पाद पंकजम् नमामि देवि नर्मदे...

9669909055
www.narmadehar.comजिन संस्कृतियों ने अपने इतिहास का संरक्षण नहीं किया अथवा उसका तिरस्कार किया, वे या तो नष्ट हो गईं अथवा समय के साथ परिवर्तित कर दी गईं।

किसी भी संस्कृति का वैभव उसके साहित्य, प्राचीन भवनों, किलों, धर्मस्थलों तथा कला के माध्यम से पहचाना जाता है। यही धरोहरें भावी पीढ़ी को अपने इतिहास से परिचित कराती हैं तथा सुदृढ़ भविष्य की नींव रखती हैं।

इन दिव्य एवं महान धरोहरों को काल का प्रभाव और आक्रांताओं का आक्रमण जितना क्षति नहीं पहुँचाता, उससे कहीं अधिक भावी पीढ़ी की उपेक्षा उन्हें नष्ट कर देती है।

आज आवश्यकता है कि इन धरोहरों का संरक्षण किया जाए, उनके निकट जाकर उनके महत्व को समझा जाए तथा उनके गौरव और महत्ता को जन-जन तक पहुँचाया जाए।

नर्मदे हर सेवा संस्थान इसी उद्देश्य को आधार बनाकर इन पवित्र स्थलों तक पहुँचकर उनकी दिव्य ऊर्जा को आत्मसात करते हुए यथाशक्ति सेवा, संरक्षण एवं सुरक्षा का कार्य कर रहा है। आप सभी से विनम्र निवेदन है कि इस अभियान में तन, मन और यथासंभव सहयोग प्रदान करें।

माँ नर्मदा सप्तकल्पांतजीवी होकर मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र की प्रत्यक्ष जीवनदायिनी नदी है। संपूर्ण विश्व में केवल माँ नर्मदा की ही परिक्रमा की जाती है। सनातन धर्म में नर्मदा परिक्रमा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इसका कारण यह है कि अनादिकाल से देवताओं के युग से लेकर मानव सभ्यता के प्रारंभिक काल तथा आज तक इसके तटों पर अनेक सभ्यताएँ पोषित एवं पल्लवित होती रही हैं।

माँ नर्मदा असंख्य रहस्यों से परिपूर्ण है। पश्चिम की ओर प्रवाहित होने वाली इस पतित-पावनी माँ के दोनों तटों पर पाँच हजार से अधिक दिव्य शिवालय तथा अन्य देवालय स्थित हैं, जो स्वयंभू अथवा देवताओं, ऋषियों, असुरों और तत्त्ववेत्ताओं द्वारा स्थापित माने जाते हैं।

वेदकाल से लेकर पुराणकाल तक माँ नर्मदा के दोनों तटों पर असंख्य देवताओं, ऋषियों, असुरों, तत्त्ववेत्ताओं, साधु-संतों, तपस्वियों तथा भक्तों ने तपस्या की है और आज भी वे प्रत्यक्ष अथवा सूक्ष्म रूप में यहाँ साधना कर रहे हैं।

मां नर्मदा के दोनों तटों पर ऐसे स्थान है जहां स्वयं देवताओं जैसे सूर्य-चंद्र, दिव्य ऋषि-मुनियों ने जन्म लिया और कठोर तप से भगवान को प्रकट किया। ये स्थान अत्यंत दिव्य होकर आध्यात्मिक एवं सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यहां आकर भक्तों को असीम ष्षांति के साथ ही आध्यात्मिक उर्जा भी प्राप्त होती है। 
लाखांे वर्ष पूराने इन दिव्य स्थानों कर वर्णन षिव पूराण, स्कंद पूराण, मार्कण्डेय पूराण में विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है।

मां नर्मदा के जीवन एवं चरित्र का वर्णन सर्वप्रथम ऋषि मार्कण्डेय ने राजा युधिष्ठिर को सुनाया था जिसे मार्कण्डेय पूराण कहा जाता है किंतु उस समय वृद्धावस्था के कारण उन्हें जो-जो स्थान स्मरण होते गए वे सुनाते गए। इस कारण से पूराण में परिक्रमा क्रम से अथवा मार्ग क्रम से वर्णन न होकर आगे-पीछे है। साथ ही घटनाक्रम के समय स्थान विषेष का भौगोलिक नाम, स्थिति, परिचय और वर्तमान परिस्थिति में काल प्रभाव से बहुत भिन्नता होने से इन स्थानों के महत्व का लोप होकर उपेक्षित होने से जीर्ण-षीर्ण हो नष्ट हो रहे हैं। आक्रांताओं के प्रभाव के पष्चात् राजनैतिक उपेक्षा और ज्ञान के अभाव में ये स्थान राख में दबी चिंगारी की भांति दबे पड़े हैं।

वर्तमान परिदृष्य में सकारात्मक वातावरण और इच्छाषक्ति के कारण काषी, अयोध्या, ओंकारेष्वर आदि अनेक दिव्य स्थानों का जीर्णाेद्धार हुआ है। यदि मां नर्मदा के दोनों तटों पर स्थित इन स्थानों के माहात्म्य को उजागर कर इनकी दिव्यतो को आमजन तक पहुंचाने का प्रयास किया जाए तो जनमानस ओर ष्षासकीय सहयोग से इन स्थानों का कायाकल्प हो सकता है जो कि आध्यात्मिक पर्यटन के केंद्र स्थापित हो सकते हैं साथ ही मां नर्मदा की कृपा भी होगी।

यह कार्य ष्षासकीय से अधिक जनभागीदारी से संभव होगा, इसमें सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

इसका क्रियान्वयन इस प्रकार हो सकता है-
1.    नर्मदा तट पर स्थित प्रत्येक षिवालय को विस्थापित न किया जाए। उसका उसी स्थान पर पूर्ण संरक्षण हो। पानी के प्रसार से पत्थर के प्राकृतिक घाट डूब गए हैं। नए घाटों का निर्माण हो।  प्रत्येक स्थान का संपूर्ण विवरण एकत्र हो उसका प्रसार हो।
2.    स्थानीय लोगों को जागृत कर इन स्थानों के जीर्णोद्धार एवं व्यवस्थापन के लिए प्रेरित किया जाए। 
3.    डूब क्षेत्र आदि स्थानों पर घाट निर्माण किया जाए। 
4.    परिक्रमावासियों को इन स्थानों पर आने हेतु प्रेरित किया जाए।
5.    इन स्थानों पर मेले, उत्सव आदि आयोजन हो जिससे स्थान की लोकप्रियता और माहात्म्य में वृद्धि हो। 
6.     डूब क्षेत्र में मंदिरों के संरक्षण, जीर्णोद्धार की प्रषासनिक अनुमतियां प्रदान की जाए।  
7.    पुरातत्व विभाग को अधीनस्थ मंदिरों के जीर्णोद्धार हेतु निर्देषित किया जाए।
8.    ़इन मंदिरों का विस्थापन भी अधिक खर्चीला होगा। इससे कम खर्च में संरक्षण आसान होगा।
9.    इन मंदिरो का माहात्म्य नर्मदा के किनारे है। वहां से हटाना उनका उनका तेज खत्म करेगी। 
10.    बांध का पानी दो,तीन या चार महीने ही रहता है। ष्षेष दिनों तो ये खुले रहते हैं। नर्मदा परिक्रमा का, दर्षन का माहात्म्य तट पर होता है दूरी पर नहीं। 
11.    विस्थापन में मंदिरों का पूर्ण स्वरूप में विस्थापित होना संभव नहीं वो खंडित ही माने जाएं्रगें। जैसा अनेक स्थानों पर हुआ है। 
12.     पुनर्वास स्थल पर इनका विग्रह स्थापित  किया जा सकता है। इसके लिए ष्षासन द्वारा निर्धारित राषि दी जाए। 
13.    इन मंदिरों के संरक्षण और इनका माहात्म्य का प्रचार से र्प्यटन का विस्तार होगा।
इस संदर्भ में महोदय से निवेदन है उचित निर्णय लेकर मंदिरों के विस्थापन पर रोक लगा उन्हीे स्थानों पर संरक्षण,जीर्णोद्धार करनें की कृपा करें।

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